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रविवार, 3 अप्रैल 2016

भारतीय अर्थ-व्यवस्था आधार गौवंंश

!!!---: भारतीय अर्थ-व्यवस्था आधार गौवंंश :---!!!
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भारतीय कृषि व्यवस्था समाप्त करने के लिए अंग्रेजों ने कैसे व्यवस्थित रूप से भारत को और गौवंश बर्वाद किया , उसका इतिहास पढिएः---

कृषि का आधार गौवंश
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एक अंग्रेज रावर्ट क्लाइव ने पहले सर्वे कराया कि भारत की खेती को कैसे बर्बाद किया जाए। अंग्रेजों ने जब सर्वेक्षण करा लिया तो उनको एक बात यह पता चली कि भारतीय कृषि का आधार गौवंश है और उसका केन्द्र बिंदु है बैल। बैल गाय के बछडे़ होते है। बछड़े बैल बनते है। बैलों से खेत जोता जाता है। फिर गाय दूध देती है। किसान दूध पीता है। उसमें से शक्ति आती है तो खेत में मेहनत करता है। गाय गोबर देती है। उस गोबर का खाद बनाता है। खाद को खेत में डालता है और खेत की शक्ति बढ़ाता है। गाय मूत्र देती है। मूत्र को किसान कीटनाशक के रुप में प्रयोग में लाता है। तो गाय जो है वो भारतीय क्रषि व्यवस्था के केन्द्र में है।

कत्लखाने शुरु हुए
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यह अंग्रेजों की सरकार को पता चल गया सर्वेक्षण करा के। तो अंग्रेजों ने एक कानून और बना दिया कि भारत में गाय का कत्ल करवाओ। तो 1760 में इस देश में अंग्रेजों के आदेश पर गाय का कत्ल होना शुरु हो गया। कुछ लोगों को ऐसा लगता है और वो लोग कहते भी हैं कि राजीव भार्इ अंग्रेजों से पहले भी तो जो मुसलमान राजा थे। वो भी तो गाय का कत्ल करवाते थे। मैं आपको जानकारी देना चाहता हूँ कि एक-दो मुसलमान राजाओ को छोडकर, भारत में किसी भी राजा ने गाय का कत्ल नहीं करवाया। मुसलमानों के राजाओं के जमाने में तो भारत में ऐसा कानून रहा है कि जो गाय का कत्ल करे उसको फाँसी की सजा दी जाए। यह अंग्रेज थे जिन्होने गाय का कत्ल करवाने के लिए व्यवस्थित रुप से एक कानून बनवा दिया और सन 1760 से भारत में गाय का कत्ल करवाना अंग्रेजों ने शुरु किया।

कृषि के लिए खाद की समाप्ति
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गाय का कत्ल करवाते तो अंग्रेजों को दो फायदे होते थे। एक तो भारत के किसान का जो सबसे बड़ा पशुधन था गाय। वो खत्म होता था। गाय मरती थी तो दूध कम होता था। गाय मरती थी तो गोबर कम होता था। गोबर कम होता था तो खाद कम होती थी। गाय मरती थी तो मूत्र नहीं मिलता था। किसानों के लिए जो किटनाशक दवायें बनती थीं उसमें कमी आती थी। गाय का दूध नहीं मिलता था तो किसानों की शक्ति कम होती थी। तो लगातार गाय के कत्ल होते चले जाने के कारण भारत की खेती का भी नाश होना शुरु हो गया और अंग्रेजों ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से इस देश में कत्ल कारखाने खुलवा दिए। अंग्रेजों की सरकार ने पूरे देश में लगभग 300 से ज्यादा कत्ल कारखाने खुलवाये। जिनमें गाय और गौवंश का कत्ल किया जाता था। हजारों की संख्या में लाखों की संख्या में गाय और गौवंश का कत्ल होता था। गाय का मांस यहाँ से भेज दिया जाता था, इंग्लैंड में जाता था। अंग्रेजों की सरकार के जो सिपार्इ होते थे वो जो गाय का मांस खाते थे। आप जानते हैं युरोप के देश की जो प्रजा है यह जो गोरी प्रजा है। यह गाय का मांस सबसे ज्यादा खाती है। जितनी गोरी प्रजा है पूरी दुनिया में इसको गाय का मांस सबसे अच्छा लगता है। तो गाय कत्ल होता था भारत में। उसका मांस इंग्लैंड जाता था। और गाय का कत्ल कर के अंग्रेजों की फौज जो भारत में रहती थी। उसको मांस बेचा जाता था। उसको मांस दिया जाता था।

किसान को बर्वाद करने हुए गौहत्या
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तो भारत के किसानों को बर्बाद करने के लिए जो तीसरा काम अंग्रेजों ने किया वो गाय के कत्ल करवाने के बाद में अंग्रेजों को ऐसा लगा कि सिर्फ गाय के कत्ल करवाने से बात नहीं बनेगी। गाय जहाँ से पैदा होती है। उस नंदी का कत्ल पहले करो, तो अंग्रेजों ने पहले नंदी का कत्ल करवाना शुरु किया और बहुत ही व्यवस्थित पैमाने पर गाय और नंदी का कत्ल अंग्रेजों ने करवाया। हम लोगों ने जो दस्तावेज इकठठे किये हैं उनसे पता चलता है कि 1760 से लेकर 1947 के साल तक अंग्रेजों ने करीब 48 करोड़ से ज्यादा गाय और बैल का कत्ल करवाया। और यह जो 48 करोड़ गाय और नंदियो के कत्ल करवा दिये। मैं कभी-कभी कल्पना करता हूँ कि वो गाय नहीं काटी गर्इ होती। वो नंदी नहीं काटे गए होते तो आज हिन्दुस्तान में गाय की संख्या हमारी आबादी से तीन गुनी ज्यादा होती। कम से कम इस देश में डेढ सौ करोड़ से ज्यादा गाय और बैल होते लेकिन अंग्रेजों ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से यह कत्ल करवा कर हिन्दुस्तान के किसानों का सत्यानाश करवाया।

1910 में 350 बूचड़खाने जो दिन से लेकर रात तक गौ कत्ल करते थे उनके परिणाम के रूप में भारत व्यावहारिक रूप से पशुओं से महरूम होता गया। इस प्रकार यूरिया और फास्फेट जैसे औद्योगिक खाद भारत की खेती में जगह लेने लगे।

नया रिवाज
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अंग्रेजों के जाने का बाद भारत के मुसलमानों ने इस रिवाज को एक नया रूप दिया और होने लगा गायों का कत्लेआम। पहले खुद का पेट भरने के लिए गौमांस का उपयोग हुआ, फिर इसे व्यापार में तब्दिल कर दिया गया। भारत में मुसलमानों के बाद गौमांस का इस्तेमाल बाकी धर्मों के कुछ लोग भी करने लगे। कुछ लोग समर्थन में उतर आए तो कुछ लोगों ने इसका विरोध किया ।लेकिन गौहत्या नहीं रूकी।

जवाहर का दोगलापन
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एक सवाल के जवाब में गांधीजी ने कहा था कि जिस दिन भारत स्वतंत्रत हो जायेगा उसी दिन से भारत में सभी वध घरों को बंद किया जाएगा, 1929 में एक सार्वजनिक सभा में नेहरू ने कहा कि अगर वह भारत का प्रधानमंत्री बने तो वह पहला काम इन कसाईखानो को बंद करने का करेंगे । इन 63 सालों में 75 करोड गायों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। 1947 के बाद से संख्या 350 से 36,000 तक बढ़ गई है । सरकार की अनुमति से 36,000 कतलखाने चल रहे हैं । इसके इलावा जो अवैध रूप से चल रहे है वो अलग है उनकी संख्या की कोई पूरी जानकारी नही है।

1952 में संसद में उठा था गौहत्या का मुद्दा
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आजादी के 5 साल बाद पहली बार संसद में गौहत्या के मुद्दें को उठाया गया था लेकिन तब तक इस क्षेत्र ने व्यापार का रूप ले लिया था । इसलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू गौमांस पर प्रतिबंध लगाने की बात से कतराते थे, क्योकिं गौमांस भारत में सस्ता होने के कारण कुछ लोगों का मुख्य आहार भी बन चुका था। गौमांस का निर्यात देश से बाहर भी होने लगा था और इसे देश की आर्थिक स्थिति से जोड़ कर देखा जाने लगा था।

26 अक्टुबर 2005 को बना गौहत्या विरोधी कानून
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 26 अक्टूबर 2005 को एक ऐतिहासिक फैसले में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अधिनियमित गौहत्या विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। फिर एक-एक कर के देश के कई राज्यों में गौमांस पर प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन इसे पूरी तरह खत्म करने में भारत की सरकारें नाकाम रही।

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बुधवार, 30 मार्च 2016

बिहार में शराबबन्दी या कुछ और.....

!!!---: बिहार में शराबबन्दी या कुछ और :---!!!
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बिहार में एक अप्रैल से देसी शराब की बिक्री पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगा दिया गया है. वहीँ नई उत्पाद और मद्य नीति के तहत विदेशी शराब की बिक्री को भी चिह्नित कर दिया गया है ।

पहले चरण में देसी-मसालेदार शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाने के लिए जो भी आवश्यक क़दम है, उसे पूरा किया जा चुका है ।

बिहार सरकार का छुपा हुआ कार्यक्रम है , जिसके अन्तर्गत सभी देशी शराब की दुकानों को बन्द करना है । इसके स्थान पर कुछ गिनी चुनी विदेशी कम्पनियों की शराब बिकेंगी ।

कुछ बडी विदेशी शराब कम्पनियाँ सरकार पर दबाव बनाकर और कुछ पैसे देकर देशी कम्पनियों को बन्द कराने के लिए कानुन बनवाया और अपनी शराब को बेचने का कार्यक्रम तैयार किया है ।

जो स्थानीय लोग शराब बेचकर अपना पेट पाल रहे थे, अब वे बेरोजगार हो जाएँगे । अब वे पेट पालने के लिए चोरी आदि कुकर्म करेंगे ।

अपने देश में इस प्रकार का कार्यक्रम पिछले 65 सालों से चल रहा है । सरकारें देशी कम्पनियों का नुकसान करके विदेशी कम्पनियों से पैसा खाकर उन्हें बढावा देती है ।

कहा तो ये जा रहा है, अगले वर्ष पूर्ण शराबबन्दी होगी । इसका क्या अभिप्राय है । यही कि पूरे नौ महीने विदेशी शराब बिहार में परोसी जाएगी । इन नौ महीनों में विदेशी कम्पनियाँ चाँदी कुटेंगी ।

सबसे बडी बात ये होगी कि सरकार खुद विदेशी बेचेगी । मतलब ये कि तेरी भी दीवाली और मेरी भी । तू भी लूट, मैं भी लुटूँगा । मतलब ये कि इन्हें लूटकर और गरीब बनाना है ।

यदि सरकार की मंशा (इच्छा) बिहार की जनता की भलाई ही करनी थी तो नौ महीने का लम्बा समय क्यों दिया । आप एक अप्रैल से पूर्ण शराबबन्दी कर देते ।

ऐसा न करके गोलमाल किया है ।

विदेशी शराब बनाने वाली एक बडी कम्पनी के अधिकारी खुद दावा किया है कि सरकार विदेशी शराब को बन्द नहीं कर सकती । इसका मतलब क्या है, यही कि उसने जो पैसे खर्च किए वे इन नौ महीनों में कमा लेगा ।

नीतीश कुमार ने चुनाव के समय यह घोषणा की थी कि पूर्ण शराबबन्दी होगी तो फिर सरकार क्यों विदेशी कम्पनियों को छूट दे रही है ।



सरकार अब पलट गई है, आखिर क्यों, चुनाव के बाद से लेकर अब तक बहुत बदलाव आ चुका है । इस बीच में विदेशी कम्पनियों ने सरकार पर दबाव बना लिया ।


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शनिवार, 12 मार्च 2016

काश गाँधी न होता तो अजादी 35 साल पहले मिल जाती

काश गाँधी न होता तो अजादी 35 साल पहले मिल जाती
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आजादी की लड़ाई का इतिहास लिखे जाने के वक्त नाइंसाफी का शिकार होने वालों में एक ऐसा क्रांतिकारी भी था, जिसका प्लान अगर कामयाब हुआ होता, साथी ने गद्दारी नहीं की होती तो देश को ना गांधी की जरूरत पड़ती और ना बोस की। देश भी 32 साल पहले ही यानी 1915 में आजाद हो गया होता। उस दौर का हीरो था वो, जब खौफ में लोग घरों में भी सहम कर रहते थे, वो अकेला जहां अंग्रेजों को देखता, उन्हें पीट देता था, यतीन्द्र नाथ मुखर्जी के बारे में यही मशहूर था। एक बार तो एक रेलवे स्टेशन पर यतीन्द्र नाथ ने अकेले ही आठ आठ अंग्रेजों को पीट दिया था।
बलिष्ठ देह के स्वामी यतीन्द्रनाथ मुखर्जी साथियों के बीच बाघा जतिन के नाम से मशहूर थे। बंगला के नादिया में पैदा हुए थे, जतिन जो अब बांग्लादेश में है। पिता की मौत के बाद मां शरतशशि ने ही अपने मायके में उनकी परवरिश की, शुरू से ही उनकी रुचि फिजिकल गेम्स में रही, स्विमिंग और हॉर्सराइडिंग के चलते वो बलिष्ठ शरीर के स्वामी बन गए।


11 साल की उम्र में ही उन्होंने शहर की गलियों में लोगों को घायल करने वाले बिगड़ैल घोड़े को काबू किया, तो लोगों ने काफी तारीफ की। उनकी मां कवि स्वभाव की थीं, और वकील मामा के क्लाइंट रवीन्द्र नाथ टैगोर के साथ उनके परिवार का अक्सर मिलना होता था। जतिन पर इस सबका बहुत प्रभाव पड़ा। उनके बलिष्ठ शरीर और चैरिटेबल कामों की चर्चा होने लगी। एक वृद्ध मुस्लिम महिला का घास का गट्ठर रोज उसके घर पहुंचाना, उसके साथ खाना खाना और उसको हर महीने मदद के लिए कुछ पैसा भेजना, लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया। दूसरी तरफ वो ध्रुव, प्रहलाद, हनुमान और राजा हरिश्चंद्र जैसे रोल नाटकों में करने लगे। इसी दौरान उन्होंने एक भारतीय का अपमान करने पर एक साथ चार अंग्रेजों को पीट दिया। अंग्रेज उनसे उलझने से बचने लगे।

कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज में पढ़ने के दौरान वो स्वामी विवेकानंद के पास जाने लगे, जिनसे उन्हें भरोसा मिला कि स्वस्थ फौलादी शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। स्वामी विवेकानंद ने उन्हें अम्बू गुहा के देसी जिम में भेजा, ताकि वो कुश्ती के दाव पेच सीख सकें।
विवेकानंद के सम्पर्क में आकर उनके अंदर ब्रहम्चारी रहकर देश के लिए कुछ करने की इच्छा तेज हुई। फिर वो 1899 में मुजफ्फरपुर में बैरिस्टर पिंगले के सेक्रेटरी बनकर पहुंचे। जो बैरिस्टर होने के साथ-साथ एक इतिहासकार भी था, जिसके साथ रहकर जतिन ने महसूस किया कि भारत की एक अपनी नेशनल आर्मी होनी चाहिए। शायद यह भारत की नेशनल आर्मी बनाने का पहला विचार था। जो बाद में मोहन सिंह, रास बिहारी बोस और सुभाष चंद्र बोस के चलते अस्तित्व में आई। हालांकि इसी बैरिस्टर पिंगले के काफिले पर बम फेंकने के चलते 1908 में खुदीराम बोस को फांसी हुई थी, ये अलग बात है निशाने पर एक दूसरा मजिस्ट्रेट किंग्सफोर्ड था। दिलचस्प बात है कि जिस कॉलेज में जतिन पढ़े, आज उसी कलकत्ता सेंट्रल कॉलेज का नाम खुदीराम बोस कॉलेज है।


फिर घरवालों के दवाब में जतिन ने शादी कर ली। लेकिन उनके पहले बेटे की अकाल मौत के चलते आंतरिक शांति के लिए जतिन ने भाई और बहन के साथ मिलकर हरिद्वार की यात्रा पर निकल पड़े। लौट कर आए तो पता चला कि उनके गांव में एक तेंदुए का आतंक है, तो वो उसे जंगल में ढूंढने निकल पड़े, लेकिन सामना हो गया रॉयल बंगाल टाइगर से। वो खतरनाक बाघ देखकर ही कोई सदमे से मर जाता, लेकिन जतिन ने उसको अपनी खुखरी से मार डाला। बंगाल सरकार ने एक समारोह में सम्मानित किया।

अंग्रेजी अखबारों में जमकर उनकी तारीफ हुई, लोग उन्हें बाघा जतिन के नाम से पुकारने लगे। लेकिन 1900 में ही अनुशीलन समिति की स्थापना हुई, उस वक्त क्रांतिकारियों का सबसे बड़ा संगठन। बाघा जतिन ने इसकी स्थापना में अहम भूमिका निभाई, अरविंदो घोष यानी महर्षि अरविंदो से मिलने के बाद इस काम में तेजी लाई गई। बंगाल के हर जिले में इसकी शाखा खोली गई, फिर बिहार और उड़ीसा का रुख किया गया।
इसी बीच 1905 में हुआ कलकत्ता में प्रिंस ऑफ वेल्स का दौरा हुआ, ब्रिटेन के राजकुमार। अंग्रेजों की बदतमीजियों से खार खाए बैठे जतिन ने प्रिंस के सामने ही उनको सबक सिखाने की ठानी। प्रिंस ऑफ वेल्स का स्वागत जुलूस निकल रहा था, एक गाड़ी की छत पर कुछ अंग्रेज बैठे हुए थे, और उनके जूते खिड़कियों पर लटक रहे थे, गाड़ी में बैठी महिलाओं के बिलुकल मुंह पर। भड़क गए जतिन और उन्होंने अंग्रेजों से उतरने को कहा, लेकिन वो नहीं माने तो ऊपर चढ़ गए बाघा जतिन और एक-एक करके सबको पीट दिया। तब तक पीटा जब तक कि सारे नीचे नहीं गिर गए।

चूंकि ये घटना प्रिंस ऑफ वेल्स की आंखों के सामने घटी थी, तो अंग्रेज सैनिकों का भारतीयों के साथ ये बर्ताव उनके साथ सबने देखा। भारत सचिन मार्ले को पहले ही इस तरह की कई शिकायतें मिल चुकी थीं। बाघा जतिन की बजाय उन अंग्रेजों को ही दोषी पाया गया, लेकिन इस घटना से तीन बड़े काम हुए। अंग्रेजों के भारतीयों के व्यवहार के बारे में उनके शासकों के साथ-साथ दुनियां को भी पता चला, भारतीयों के मन से उनका खौफ निकला और बाघा जतिन के नाम के प्रति क्रांतिकारियों के मन में सम्मान और भी बढ़ गया।

फिर जतिन ने वारीन्द्र घोष के साथ देवघर में एक बॉम्ब फैक्ट्री शुरू की, लेकिन साथ-साथ जतिन विवेकानंद के प्रभाव में गरीबों के लिए, भारतीय सैनिकों के लिए महामारी या कुम्भ जैसे बड़े आयोजनों के वक्त मेडिकल कैम्प्स चलाने जैसे कई सोशल कामों में भी लगे रहे। हालांकि उस दौर के अंग्रेज लेखकों के मुताबिक इस सोशल कामों के जरिए वो नये क्रांतिकारियों की भर्ती करने और अलग-अलग इलाकों में अपने क्रांतिकारी संगठनों की मीटिंग करने के लिए इस्तेमाल कर रहे थे। तीन साल के लिए उनको दार्जीलिंग भेजा गया, जहां उन्होंने अनुशीलन समिति की एक शाखा बांधव समिति शुरू की। लेकिन एक दिन सिलीगुड़ी स्टेशन पर फिर अंग्रेजों के एक मिलिट्री ग्रुप से उनकी भिड़ंत हो गई। कैप्टन मर्फी की अगुवाई में अंग्रेजों ने जतिन से बदतमीजी की, तो जतिन ने अकेले उन आठों को जमकर मारा।


इंगलिश न्यूज पेपर्स में उनका मजाक बनाया गया, कि अकेले भारतीय ने आठ अंग्रेज मिलिट्री ऑफीसर्स को जमकर पीटा। मजिस्ट्रेट ने भी उन अफसरों से कहा कि केस वापस ले लो, जतिन ने खेद जता दिया, लेकिन इस चेतावनी के साथ कि अगर मेरे देश के लोंगों के साथ ऐसा होगा तो मैं भी ऐसे ही करूंगा। बाद में जतिन से उसने पूछा भी कि तुम कितने लोगों को एक साथ पीट सकते हो? तो जतिन का जवाब था, ईमानदार हो तो एक भी नहीं, बेईमानों की गिनती नहीं।

अलीपुर बॉम्ब केस में ज्यादातर बड़े क्रांतिकारी नेता फंस गए, ऐसे में सारी जिम्मेदारी सिर पर आ गई बाघा जतिन के। ऐसे में उन्होंने क्रांतिकारी गतिविधियां जारी रखने के लिए एक सीक्रेट संस्थाएं खड़ी की, जुगांतर पार्टी की भी कमान संभाली। अरविंद घोष की इस संस्था से उस वक्त बंगाल के सभी बड़े क्रांतिकारी जुड़े थे, बाद में सबको या तो काला पानी की सजा मिली या किसी पॉलटिकल पार्टी से जुड़कर बच गए।
जतिन मुखर्जी ने अलग-अलग नामों से कई संस्थाएं शुरू कीं, कोई कॉटेज इंडस्ट्री के लिए काम कर रही थी, कोई वयस्कों के लिए नाइट स्कूल चला रही थी, होम्योपैथी डिस्पेंसरीज खोल रही थी, एग्रीकल्चर में एक्सपेरीमेंट के लिए काम कर रही थीं, यहां तक कि सर डेनियल की मदद से जतिन ने कई स्टूडेंट्स को देश से बाहर पढ़ने के लिए भेजा। उन्हीं में से कुछ को नॉर्थ अमेरिका भेजा गया, जहां उनको मिलिट्री ट्रेनिंग मिली, हिंदू और सिख अप्रवासियों ने उन्हें मदद की, जो बाद में गदर पार्टी की स्थापना का आधार बना। उन्हीं में से हेम दास और पांडुरंग एम बापट ने रूसी क्रांतिकारी/आराजकतावादी निकोलस सेफ्रांसकी से बम बनाने की ट्रेनिंग भी ली।

इसी बीच फोर्ट विलियम में तैनात जाट रेजीमेंट को भड़काने के आरोप में जतिन दा को गिरफ्तार कर लिया गया, ये इसलिए और भी अहम हो जाता है, क्योंकि उन दिनों फोर्ट विलियम से देश की सरकार चलती थी। उस वक्त कोलकाता अंग्रेजों की राजधानी थी। अंग्रेज सरकार बाघा जतिन, अरविंदो घोष, रास बिहारी बोस जैसे कई बंगाली क्रांतिकारियों से तंग आ गई थी, उसको कोलकाता सुरक्षित नहीं लग रहा था। अंग्रेजों ने अगर अपनी राजधानी 1912 में कोलकाता से बदलकर दिल्ली बनाई तो इसकी बड़ी वजह ये क्रांतिकारी थे, उनमें शायद सबसे बड़ा नाम बाघा जतिन का था। तमाम सामाजिक कामों और क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाने की खातिर जतिन ने भारत में एक नया तरीका ईजाद किया, जिसके बारे में अंग्रेजी इतिहासकारों ने लिखा है ‘बैंक रॉबरी ऑन ऑटोमोबाइल्स टैक्सी कैब्स’।

कई हथियारों की खेप जतिन की लीडरशिप में लूट ली गईं। लेकिन जतिन का नाम सामने नहीं आता था। सीक्रेट सोसायटी की इन्हीं दिनों भारतीयों पर अन्याय करने वाले सरकारी अधिकारियों चाहे अंग्रेज हों या भारतीयों को मारने का ऑपरेशन भी शुरू कर दिया, लेकिन एक सरकारी वकील और अंग्रेज डीएसपी को खत्म किया गया, तो एक क्रांतिकारी ने जतिन का नाम उजागर कर दिया।

वायसराय लॉर्ड मिंटो ने उस वक्त कहा था, “ A spirit hitherto unknown to India has come into existence , a spirit of anarchy and lawlessness which seeks to subvert not only British rule but the Governments of Indian chiefs. “ । इसी स्प्रिट को बाद में इतिहालसकारों ने ‘जतिन स्प्रिट’ का नाम दिया। जतिन को डीएसपी के मर्डर के आरोप में गिरफ्तार किया गया, फिर जाट रेजीमेंट वाली हावड़ा कॉस्पिरेसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया, राजद्रोह का आरोप लगाया गया। जितने दिन जतिन पर ट्रायल चला उतने दिन जतिन ने साथी कैदियों के सहयोग से अपने संपर्क एक नए प्लान में लगाए। ये शायद उनकी जिंदगी का सबसे बड़ा प्लान था, देश को आजाद करवाने का प्लान।
इतिहास में इसे ‘जर्मन प्लॉट’ या हिंदू-जर्मन कांस्पिरेसी के नाम से जाना जाता है। अगर वो कामयाब हो जाता तो देश को ना बोस की जरूरत पड़ती और ना गांधी की। इधर जतिन की कई सीक्रेट समितियों में अंग्रेज कोई कनेक्शन साबित नहीं कर पाए और जतिन को छोड़ना पड़ा, लेकिन अलीपुर, हावड़ा, जाट रेजीमेंट, डीएसपी मर्डर जैसे कई केसेज में जतिन का नाम आने से जतिन के लिए अब खुलकर काम करना मुश्किल हो चला था। उन्होंने अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी और उन्होंने एक रेलवे लाइन से जुड़ा एक कॉन्ट्रेक्ट ले लिया। इसी दौरान जतिन ने हरिद्वार और वृंदावन की यात्राएं की, कई सन्यासी जो क्रांतिकारियों को सपोर्ट कर रहे थे, उनसे मुलाकात की। कलकत्ता में उन्हीं दिनों जर्मनी के राजा की यात्रा हुई, नरेन भट्टाचार्य के साथ जतिन उनसे मिले और वायदा लिया कि हथियारों की बड़ी खेप की सप्लाई उनके विद्रोह के लिए जर्मनी सप्लाई करेगा।


इधर, अंग्रेजों ने राजधानी 1912 में बदल ही ली, रास बिहारी बोस और विश्वास ने हाथी के ऊपर बैठकर दिल्ली में घुसते गर्वनर लॉर्ड हार्डिंग के ऊपर चांदनी चौक में बम फेंका तो जतिन के लिए भी उस साल मुश्किल हो गई, रास बिहारी अंडरग्राउंड हो गए। 1913 में जब दामोदर नदी में बाढ़ आई तो जतिन ने बड़े पैमाने पर राहत कार्य शुरू किए, रास बिहारी भी उनकी मदद के लिए आ गए। दोनों ने मिलकर 1857 जैसा विद्रोह फिर से करने की योजना बनाई। सुभाष चंद्र बोस से पहले रास बिहारी ने जतिन में ही असली नेता पाया था। जतिन का औरा भी इंटरनेशनल था, जतिन दुनियां भर में फैले भारतीय क्रांतिकारियों के संपर्क में थे। सिएटल, पोर्टल, बैंकूबर, सैन फ्रांसिस्को हर शहर में क्रांतिकारी तैयार हो रहे थे, लाला हरदयाल और श्यामजी कृष्ण वर्मा लंदन और अमेरिका में आंदोलन की आग जिंदा जलाए हुए थे।

प्रथम विश्व युद्ध जिसके लिए गांधीजी अंग्रेजी सेना के लिए भर्ती अभियान चला रहे थे, उनको भर्ती करने वाला सार्जेन्ट भी कहा गया था, उस विश्व युद्द को क्रांतिकारियों ने अपने लिए सुनहरा मौका माना। वीरेन्द्र चट्टोपाध्याय के नेतृत्व में ज्यूरिख में बर्लिन कमेटी बनाई गई, तो लाला हरदयाल, सोहन सिंह भाखना ने गदर पार्टी ने अमेरिका और कनाडा के सिख क्रांतिकारियों को लेकर गदर पार्टी शुरू की और भारत में इसकी कमान जुगांतर पार्टी के नेता बाघा जतिन के हवाले थी। अब तैयार हुआ जर्मन प्लॉट, जर्मनी से हथियार आना था, और पैसा चुकाने के लिए जतिन के साथियों ने कई डकैतियां डालीं।

बंगाल, उत्तर प्रदेश, पंजाब, सिंगापुर जैसे कई ठिकानों में 1857 जैसे सिपाही विद्रोह की योजना बनाई गई। फरवरी 1915 की अलग-अलग तारीखें तय की गईं, पंजाब में 21 फरवरी को 23 वीं कैवलरी के सैनिकों ने अपने ऑफीसर्स को मार डाला। लेकिन उसी रेंजीमेंट में एक विद्रोही सैनिक के भाई कृपाल सिंह ने गद्दारी कर दी और विद्रोह की सारी योजना सरकार तक पहुंचा दी। सारी मेहनत एक गद्दार के चलते मिट्टी में मिल गई।

अगले दिन पंजाब मेल को हावड़ा में लूटने की प्लानिंग थी, लेकिन पंजाब सीज कर दिया गया, ट्रेन कैंसल कर दी गई। आगरा, लाहौर, फिरोजपुर, रंगून में विद्रोह सूचना लीक हो जाने की वजह से दबा दिया गया। रास बिहारी बोस ने दो दिन पहले यानी 19 फरवरी को ही विद्रोह करवाने की कोशिश की, लेकिन उतनी कामयाबी नहीं मिली। मेरठ और बनारस में भी विद्रोही नेता गिरफ्तार कर लिए गए। केवल सिंगापुर में पांचवी लाइट इनफेंट्री में विद्रोह कामयाब रहा, लेकिन केवल एक हफ्ते तक। ऑपरेशन फेल हुआ तो रास बिहारी बोस को सुरक्षित जापान रवाना कर दिया गया। गदर पार्टी के कई नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, काला पानी की सजा दी गई।

लेकिन बाघा जतिन अभी भी अंडरग्राउंड रहकर क्रांतिकारियों के बीच एक्टिव थे, योजना बनी कि जर्मनी से जो हथियार आएंगे वो अप्रैल 1915 में उड़ीसा का बालासोर तट पर उतरेंगे, वहां से तीस किलोमीटर दूर मयूरभंज में जतिन को भेजकर अंडरग्राउंड कर दिया गया। हथियारों की खेप मंगाने के लिए एक फर्जी कंपनी यूनीवर्सल एम्पोरियम भी खड़ी कर दी गई।

इधर जतिन ने नरेन भट्टाचार्य यानी एमएन रॉय को जर्मनी के अधिकारियों के पास हथियारों की बातचीत के लिए भेजा, उनको बताया गया कि हथियारों की खेप निकल चुकी है, लेकिन एक चेक जासूस इमेनुअल विक्टर वोस्का, जो डबल एजेंट भी था, अमेरिका के लिए भी काम करता था, को भनक लगी और उसने सारा खेल खराब कर दिया।

चेक के ही रॉस हेडविक ने बाद में लिखा कि ‘इस प्लान में अगर इमेनुअल विक्टर वोस्का ना घुसता तो किसी ने भारत में गांधी का नाम तक ना सुना होता और राष्ट्रपिता बाघा जतिन को कहा जाता।‘

वहां से खबर अमेरिका को मिली, अमेरिका से अंग्रेजों को मिली, इंगलैंड से खबर भारतीय अधिकारियों के पास आई और उड़ीसा को पूरा समुद्र तट सील कर दिया गया। उस वक्त ऐसा कोई संचार साधन नहीं था कि समंदर में जहाज को खबर हो पाती।


इधर, पुलिस को सुराग मिला कि जतिन और उसके साथी कप्टिपाड़ा गांव में हैं। जतिन के साथ मनोरंजन और चित्तप्रिया थे। वहां से वो निकल भागे, जतिन और उनके साथी जंगलों की तरफ भागे, अंग्रेजों ने जतिन पर भारी इनाम का ऐलान कर दिया, अब गांव वाले भी उन्हें ढूंढने लगे। इधर भारी मात्रा में जर्मन हथियार बरामद कर लिया गया। क्रांति फेल हो चुकी थी। सपना मिट्टी में मिल चुका था।

जतिन का आखिरी वक्त करीब आ चुका था, वो घिर चुके थे। आसपास से भी तमाम अंग्रेजी फोर्स को बुला लिया गया था। यतीश नामक एक क्रांतिकारी बीमार था। साथियों ने कहा भी कि आप निकल जाओगे तो दोबारा से आजादी की नई योजना बना लोगे, लेकिन जतिन उसे अकेला छोड़कर जाने को तैयार नहीं थे। चित्तप्रिय नामक क्रांतिकारी उनके साथ था। दोनों तरफ़ से गोलियां चली। चित्तप्रिय वहीं शहीद हो गया। वीरेन्द्र तथा मनोरंजन नामक अन्य क्रांतिकारी मोर्चा संभाले हुए थे। इसी बीच जतिन का शरीर गोलियों से छलनी हो चुका था। गिरफ्तारी देते वक्त जतिन ने कलेक्टर किल्वी से कहा- 'गोली मैं और चित्तप्रिय ही चला रहे थे। बाकी के तीनों साथी बिल्कुल निर्दोष हैं।“ अगले दिन बालासोर हॉस्पिटल में उनकी मौत हो गई।

उस वक्त तक गांधीजी साउथ अफ्रीका में ही थे, जब वो भारत आए तो गांधीजी ने कोलकाता पुलिस के डिटेक्टिव डिपार्टमेंट के हैड और बंगाल के पुलिस कमिश्नर रहे चार्ल्स टेगार्ट से कहा था कि ‘जतिन एक डिवाइन पर्सनेलिटी थे’। टेगार्ट ने अपने साथियों से कहा था कि ‘अगर बाघा जतिन अंग्रेज होते तो अंग्रेज लोग उनका स्टेच्यू लंदन में ट्रेफलगर स्क्वायर पर नेलशन के बगल में लगवाते’। जतिन के शब्द लोग आज भी याद करते हैं, वो कहा करते थे, ‘अमरा मोरबो, जगत जागबे’ यानी ‘हमारे मरने से देश जगेगा’।

उनकी मौत के बाद चले ट्रायल के दौरान ब्रिटिश प्रोसीक्यूशन ऑफीसर ने कहा, ““Were this man living, he might lead the world.” । इस वाक्य से अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितना खौफ होगा बाघा जतिन का उस वक्त। चार्ल्स टेगार्ट ने तो लिखा है, कि अगर जर्मनी से वो हथियारों की खेप क्रांतिकारियों के हाथ में पहुंच जाती तो हम जंग हार जाते। उसके बावजूद इस योद्धा के स्टेच्यू देश की राजधानी में मिलना तो दूर किसी बच्चे को उसका नाम नहीं पता होगा। हां कोलकाता के विक्टोरिया मेमोरियल पर जरूर उनका एक स्टेच्यू है। पश्चिम बंगाल के अलावा शायद ही किसी राज्य में बच्चे इतिहास की किताबों में बाघा जतिन का नाम पढ़ते होंगे।

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मंगलवार, 8 मार्च 2016

बांग्लादेश बनेगा मतनिरपेक्ष

!!!---: बांग्लादेश बनेगा मतनिरपेक्ष :---!!!
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हाल के दिनों में गैर मुस्लिम समुदाय के लोगों पर हुए लगातार हमलों की वजह से बांग्लादेश अपने आधिकारिक धर्म इस्लाम से किनारा कर सकता है।


डेली मेल की इस रिपोर्ट के मुताबिक, बांग्लादेश का सुप्रीम कोर्ट एक ऐसे मामले पर सुनवाई कर रहा है, जिसमें इस्लाम को देश का आधिकारिक धर्म बनाए रखने को चुनौती दी गई है।


पिछले दिनों इस देश में हिन्दू और ईसाई धर्मावलंबियों पर इस्लामिक कट्टरपंथियों के हमले तेज हुए हैं। यही नहीं, अल्पसंख्य शिया समुदाय को भी निशाने पर लिया गया है।


वर्ष 1971 में जब बांग्लादेश स्वतंत्र घोषित हुअा था, तब इसे एक धर्मनिरपेक्ष देश घोषित किया गया। लेकिन वर्ष 1988 में संविधान में संशोधन कर इसे इस्लामिक राष्ट्र बना दिया गया।


बांग्लादेश मुस्लिम बहुल देश है। यहां मुस्लिम जनसंख्या करीब 90 फीसदी है, जबकि यहां 8 फीसदी हिन्दू रहते हैं। बाकी 2 फीसदी में बौद्ध, ईसाई व अन्य धर्मावलंबियों का वास है।

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