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रविवार, 3 अप्रैल 2016

भारतीय अर्थ-व्यवस्था आधार गौवंंश

!!!---: भारतीय अर्थ-व्यवस्था आधार गौवंंश :---!!!
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भारतीय कृषि व्यवस्था समाप्त करने के लिए अंग्रेजों ने कैसे व्यवस्थित रूप से भारत को और गौवंश बर्वाद किया , उसका इतिहास पढिएः---

कृषि का आधार गौवंश
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एक अंग्रेज रावर्ट क्लाइव ने पहले सर्वे कराया कि भारत की खेती को कैसे बर्बाद किया जाए। अंग्रेजों ने जब सर्वेक्षण करा लिया तो उनको एक बात यह पता चली कि भारतीय कृषि का आधार गौवंश है और उसका केन्द्र बिंदु है बैल। बैल गाय के बछडे़ होते है। बछड़े बैल बनते है। बैलों से खेत जोता जाता है। फिर गाय दूध देती है। किसान दूध पीता है। उसमें से शक्ति आती है तो खेत में मेहनत करता है। गाय गोबर देती है। उस गोबर का खाद बनाता है। खाद को खेत में डालता है और खेत की शक्ति बढ़ाता है। गाय मूत्र देती है। मूत्र को किसान कीटनाशक के रुप में प्रयोग में लाता है। तो गाय जो है वो भारतीय क्रषि व्यवस्था के केन्द्र में है।

कत्लखाने शुरु हुए
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यह अंग्रेजों की सरकार को पता चल गया सर्वेक्षण करा के। तो अंग्रेजों ने एक कानून और बना दिया कि भारत में गाय का कत्ल करवाओ। तो 1760 में इस देश में अंग्रेजों के आदेश पर गाय का कत्ल होना शुरु हो गया। कुछ लोगों को ऐसा लगता है और वो लोग कहते भी हैं कि राजीव भार्इ अंग्रेजों से पहले भी तो जो मुसलमान राजा थे। वो भी तो गाय का कत्ल करवाते थे। मैं आपको जानकारी देना चाहता हूँ कि एक-दो मुसलमान राजाओ को छोडकर, भारत में किसी भी राजा ने गाय का कत्ल नहीं करवाया। मुसलमानों के राजाओं के जमाने में तो भारत में ऐसा कानून रहा है कि जो गाय का कत्ल करे उसको फाँसी की सजा दी जाए। यह अंग्रेज थे जिन्होने गाय का कत्ल करवाने के लिए व्यवस्थित रुप से एक कानून बनवा दिया और सन 1760 से भारत में गाय का कत्ल करवाना अंग्रेजों ने शुरु किया।

कृषि के लिए खाद की समाप्ति
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गाय का कत्ल करवाते तो अंग्रेजों को दो फायदे होते थे। एक तो भारत के किसान का जो सबसे बड़ा पशुधन था गाय। वो खत्म होता था। गाय मरती थी तो दूध कम होता था। गाय मरती थी तो गोबर कम होता था। गोबर कम होता था तो खाद कम होती थी। गाय मरती थी तो मूत्र नहीं मिलता था। किसानों के लिए जो किटनाशक दवायें बनती थीं उसमें कमी आती थी। गाय का दूध नहीं मिलता था तो किसानों की शक्ति कम होती थी। तो लगातार गाय के कत्ल होते चले जाने के कारण भारत की खेती का भी नाश होना शुरु हो गया और अंग्रेजों ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से इस देश में कत्ल कारखाने खुलवा दिए। अंग्रेजों की सरकार ने पूरे देश में लगभग 300 से ज्यादा कत्ल कारखाने खुलवाये। जिनमें गाय और गौवंश का कत्ल किया जाता था। हजारों की संख्या में लाखों की संख्या में गाय और गौवंश का कत्ल होता था। गाय का मांस यहाँ से भेज दिया जाता था, इंग्लैंड में जाता था। अंग्रेजों की सरकार के जो सिपार्इ होते थे वो जो गाय का मांस खाते थे। आप जानते हैं युरोप के देश की जो प्रजा है यह जो गोरी प्रजा है। यह गाय का मांस सबसे ज्यादा खाती है। जितनी गोरी प्रजा है पूरी दुनिया में इसको गाय का मांस सबसे अच्छा लगता है। तो गाय कत्ल होता था भारत में। उसका मांस इंग्लैंड जाता था। और गाय का कत्ल कर के अंग्रेजों की फौज जो भारत में रहती थी। उसको मांस बेचा जाता था। उसको मांस दिया जाता था।

किसान को बर्वाद करने हुए गौहत्या
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तो भारत के किसानों को बर्बाद करने के लिए जो तीसरा काम अंग्रेजों ने किया वो गाय के कत्ल करवाने के बाद में अंग्रेजों को ऐसा लगा कि सिर्फ गाय के कत्ल करवाने से बात नहीं बनेगी। गाय जहाँ से पैदा होती है। उस नंदी का कत्ल पहले करो, तो अंग्रेजों ने पहले नंदी का कत्ल करवाना शुरु किया और बहुत ही व्यवस्थित पैमाने पर गाय और नंदी का कत्ल अंग्रेजों ने करवाया। हम लोगों ने जो दस्तावेज इकठठे किये हैं उनसे पता चलता है कि 1760 से लेकर 1947 के साल तक अंग्रेजों ने करीब 48 करोड़ से ज्यादा गाय और बैल का कत्ल करवाया। और यह जो 48 करोड़ गाय और नंदियो के कत्ल करवा दिये। मैं कभी-कभी कल्पना करता हूँ कि वो गाय नहीं काटी गर्इ होती। वो नंदी नहीं काटे गए होते तो आज हिन्दुस्तान में गाय की संख्या हमारी आबादी से तीन गुनी ज्यादा होती। कम से कम इस देश में डेढ सौ करोड़ से ज्यादा गाय और बैल होते लेकिन अंग्रेजों ने बहुत ही व्यवस्थित तरीके से यह कत्ल करवा कर हिन्दुस्तान के किसानों का सत्यानाश करवाया।

1910 में 350 बूचड़खाने जो दिन से लेकर रात तक गौ कत्ल करते थे उनके परिणाम के रूप में भारत व्यावहारिक रूप से पशुओं से महरूम होता गया। इस प्रकार यूरिया और फास्फेट जैसे औद्योगिक खाद भारत की खेती में जगह लेने लगे।

नया रिवाज
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अंग्रेजों के जाने का बाद भारत के मुसलमानों ने इस रिवाज को एक नया रूप दिया और होने लगा गायों का कत्लेआम। पहले खुद का पेट भरने के लिए गौमांस का उपयोग हुआ, फिर इसे व्यापार में तब्दिल कर दिया गया। भारत में मुसलमानों के बाद गौमांस का इस्तेमाल बाकी धर्मों के कुछ लोग भी करने लगे। कुछ लोग समर्थन में उतर आए तो कुछ लोगों ने इसका विरोध किया ।लेकिन गौहत्या नहीं रूकी।

जवाहर का दोगलापन
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एक सवाल के जवाब में गांधीजी ने कहा था कि जिस दिन भारत स्वतंत्रत हो जायेगा उसी दिन से भारत में सभी वध घरों को बंद किया जाएगा, 1929 में एक सार्वजनिक सभा में नेहरू ने कहा कि अगर वह भारत का प्रधानमंत्री बने तो वह पहला काम इन कसाईखानो को बंद करने का करेंगे । इन 63 सालों में 75 करोड गायों को मौत के घाट उतारा जा चुका है। 1947 के बाद से संख्या 350 से 36,000 तक बढ़ गई है । सरकार की अनुमति से 36,000 कतलखाने चल रहे हैं । इसके इलावा जो अवैध रूप से चल रहे है वो अलग है उनकी संख्या की कोई पूरी जानकारी नही है।

1952 में संसद में उठा था गौहत्या का मुद्दा
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आजादी के 5 साल बाद पहली बार संसद में गौहत्या के मुद्दें को उठाया गया था लेकिन तब तक इस क्षेत्र ने व्यापार का रूप ले लिया था । इसलिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू गौमांस पर प्रतिबंध लगाने की बात से कतराते थे, क्योकिं गौमांस भारत में सस्ता होने के कारण कुछ लोगों का मुख्य आहार भी बन चुका था। गौमांस का निर्यात देश से बाहर भी होने लगा था और इसे देश की आर्थिक स्थिति से जोड़ कर देखा जाने लगा था।

26 अक्टुबर 2005 को बना गौहत्या विरोधी कानून
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भारत के सुप्रीम कोर्ट ने 26 अक्टूबर 2005 को एक ऐतिहासिक फैसले में विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा अधिनियमित गौहत्या विरोधी कानून की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा। फिर एक-एक कर के देश के कई राज्यों में गौमांस पर प्रतिबंध लगा दिया गया लेकिन इसे पूरी तरह खत्म करने में भारत की सरकारें नाकाम रही।

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