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शनिवार, 30 जनवरी 2016

जिओ मौज से

!!!---: भारत में बाबा फ्रिज का आगमन :---!!!
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आप अपने आपको सौभाग्यशाली मानिए कि आपका जन्म भारत में हुआ है । भारत में जन्म लेने से सौभाग्यशाली कैसे ?
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अरे भई, इस भारत में फ्रिज का जो आगमन हो गया है । उऩ भारतीयों में आप अधिक सौभाग्यशाली हैं, जो आपके घर में फ्रिज आ गया है । अब आप बडे लोग हो गए हैं । शादी में घी और दूध पीने के लिए गाय मिले या न मिले, फ्रिज जरूर मिलना चाहिए । क्यों मिलना चाहिए ? आपको स्वस्थ रहना थोडे ही है , आपको जल्दी मरना है , इसलिए फ्रिज चाहिए ।

देखिए, ना तो हम पर हँसिए और ना आश्चर्यचकित होइए ।

आज हम आपको फ्रिज का रहस्य बताने वाले है । और यह भी कि क्या लाभ है फ्रिज के और क्या हानि है ?

दोस्तो आपके घर में फ़्रिज होगा ।

लेकिन क्या आप फ़्रिज का इतिहास जानते है ?
कि कैसे ये युरोप के देशो से भारत में आया और क्यों आया ? ? ? ?

कुछ वर्ष पहले KELVINATOR नाम की फ़्रिज बनाने वाली कंपनी भारत में आई ।

क्यों आई ? ?


क्या उसके मन में दया आ गई कि भारत के लोगो को ठंडा पानी पिलाना है ।

नहीं कारण कुछ और था । वो कारण ये था कि KELVINATOR की marketing खत्म हो गयी पुरे यूरोप और अमेरिका में |

क्यों खत्म हो गई ? ? ?

क्यों कि अमेरिका और यूरोप के देशो में एक समस्या शुरु हो गई (कलोरो फ़लोरो कार्बन के एमिशन की ) (C.F.C) |

ये समस्या रेफ़्रिजरेटर के कारण हुई , क्योंकि कि इससे C.F.C बहुत निकलता है ।
C.F.C से होता क्या है कि हमारे वातावरण एक़ अजोन परत होती है, जो हमको सूर्य से निकलने वाली अॅल्ट्रा वायलेट रेन से बचाती है ।ये अगर आपकी चमड़ी पर सीधी पर जाये तो आपकी चमड़ी जल जायेगी ।



तो हुआ ये कि रेफ़्रिजरेटर की जितनी तकनीकी दुनिया में विकसित हुई । उस से c.f.c की समस्या बढ़ गई और इतनी बढ़ गई कि यूरोप के कुछ देश के आसमान में ओजोन खत्म होने से एक बहुत भारी होल हो गया । जिससे वहाँ गर्मी बढ़ने लगी और गलेशियर पिघलने लगे । नदियों में पानी ज्यादा होने लगा और वहाँ बाढ़ आ गई ।

1996 में अमेरिका के लास एंजलेस में बाढ़ आई । इतना बडा अमेरिका का मैनेजमेंट सिस्टम था, लेकिन कुछ नहीं कर पाया । बाद पता लगा कि बाढ़ क्यों आई कि अमेरिका में गर्मी बढ़ गई और गलेशियर पिघले और नदियों में पानी ज्यादा हुआ और बाढ़ आई । (क्या आपको ऐसा नहीं लगता कि हर साल भारत गर्मी बढ जाती है । लोगों को कहते हुए सुना है कि हर वर्ष सर्दी कम होती जाती है और गर्मी बढती जा रही है । यदि ऐसा है तो मानिए कि भारत में अब खतरा आने ही वाला है ।)

कारण पता चला कि C.F.C एमिइशन बढ़ने से वातावरण में गर्मी बढ़ी । तो इन सारे देशो में एक भयंकर किस्म की घबराह्ट होने लगी । तो इन 12 ,13 देशो में नया एक समझौता किया कि धीरे धीरे इस c.f.c एमिइशन को technology ख्त्म कर देगें 2000 तक आते आते पुरा खत्म कर देगें ।

तो किसी ने सवाल किया कि c.f.c बनाने वाली टैकनोलोजी का क्या होगा य़ तो किसी ने कहा कि भारत में लाकर डंप कर देगें ।
फ़िर इसको लेकर वो भारत में घुस आये ।
अब डंप करने वाली वस्तु बिकेगी कैसे ? ? ?


तो इसके लिये उन्होंने हैवी विज्ञापन किये कि आपका घर कुछ भी नहीं है अगर आपके घर में फ़्रिज नहीं है । आपका घर रद्दी है , अगर आपके घर मे फ़्रिज नहीं है ।

अब रोज रोज टी वी पर आप यही बात सुनेंगे तो एक दिन फ्रिज उठा कर घर ले ही आयेगें ।

हिंदुस्तान के मूर्ख लोगों ने एक मिनट नहीं सोचा कि इस फ़्रिज की हमको क्या जरुरत है ? अब ले आये है तो किया किया पहले रोज अच्छी भली ताजी सब्ज़ी खाते थे । अब सब्ज़िया ला ला कर उसको फ़्रिज में भर देते है और बासी सब्जी खाते हैं, बासी भोजन करते हैं ।

यूरोप के देश सुखे है और वहां कुछ परंपरा भी ऐसी है कि रोज खाना नहीं बनाते । और सब्ज़िया भी रोज वहां मिलती नहीं है जो जाती है वो भारत से जाती है तो हफ़ते में एक दिन सब्ज़िया ख़रीद लाते उनको फ़्रिज में भर देते है वो पुरा हफ़ता खाते है ।

लेकिन हमारे भारत में तो हर दिन ताजी सब्ज़ी मिलती हैं और सुबह को अलग मिलती है दोपहर, शाम को अलग मिलती है । और भारत में हमारी मां हमे रोज गर्म गर्म रोटी बना कर देती है युरोप में किसी की मां नहीं देती ।

तो उनको जरुरत थी तो उनहोने अपने लिये फ़्रिज बनाया और और हम बिना वजह उठा इसे घर ले आये ।

अब एक और मूर्खता करते है पलास्टिक की बोतल मे फ़्रिज में ठंडा पानी रख देगें ।

आप जानते है पुरी दुनिया में पलास्टिक सबसे घटिया वस्तु है कुछ खाने और पीने के लिये!
जपान और कई अन्य देशो खाने पीने की चीज़े पलस्टिक पैकिंग़ मे बेचने पर बैन लगा दिया है । ।

युरोप के देशो के लोगो को एक आदत है कोई भी चीज़ पीयें तो आधे से ज्यादा उनमे बर्फ़ डालेगें और एक दम ठंडी करके पीयेंगे ।

नतीजा ये है अमेरिका मे हर दुसरा आदमी कबजियत का शिकर हैं । पिछले एक सर्वे के अनुसार 90% अमेरिका के लोगो को कबजियत की परेशानी है घंटो घंटो टायलेट मे बैठे रहते हैं लेकिन टायलेट नहीं आती । वहाँ डाक्टरों का कहना है कि उनके देश में कब्जियत का सबसे बढ़ा कारण लोगों का ठंडा पानी पीना हैं अगर इससे बचना है तो ताजा और गर्म पानी पियो ।

हमारे भारत में हजारो साल से शास्त्र यही सिखाते है कि ताजा पानी पियो ।

तो मित्रों विदेशियों द्वारा बहुत बार अपना माल बिकवाने के लिए पहले उस चीज को आपकी जरूरत बनाया जाता है !
और फिर आपके देश मे डंप किया जाता है !

वन्दे मातरम् !

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शुक्रवार, 22 जनवरी 2016

महान् नेता सुभाष जी

आज़ाद हिंद फ़ौज का गठन
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आज़ाद हिन्द फ़ौज
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सुभाष चंद्र बोस ने पाँच वर्ष की आयु में अंग्रेज़ी का अध्ययन प्रारम्भ कर दिया था। युवावस्था इन्हें राष्ट्रसेवा में खींच लाई। गाँधी जी से मतभेद होने के कारण वे कांग्रेस से अलग हो गए और ब्रिटिश जेल से भागकर जापान पहुँच गए। बोस ने जापानियों के प्रभाव और सहायता से दक्षिण-पूर्वी एशिया से जापान द्वारा एकत्रित क़रीब 40,000 भारतीय स्त्री-पुरुषों की प्रशिक्षित सेना का गठन शुरू कर दिया।


सुभाष चन्द्र बोस और आज़ाद हिन्द फ़ौज के सदस्य
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'नेताजी' के नाम से विख्यात सुभाष चन्द्र ने सशक्त क्रान्ति द्वारा भारत को स्वतंत्र कराने के उद्देश्य से 21 अक्टूबर, 1943 को 'आज़ाद हिन्द सरकार' की स्थापना की तथा 'आज़ाद हिन्द फ़ौज' का गठन किया। इस संगठन के प्रतीक चिह्न पर एक झंडे पर दहाड़ते हुए बाघ का चित्र बना होता था।

क़दम-क़दम बढाए जा, खुशी के गीत गाए जा-इस संगठन का वह गीत था, जिसे गुनगुना कर संगठन के सेनानी जोश और उत्साह से भर उठते थे।

और जापानी सैनिकों के साथ उनकी तथाकथित आज़ाद हिंद फ़ौज रंगून (अब यांगून) से होती हुई थल मार्ग से भारत की ओर बढ़ती, 18 मार्च सन् 1944 ई. की कोहिमा और इम्फ़ाल के भारतीय मैदानी क्षेत्रों में पहुँच गई। जापानी वायुसेना से सहायता न मिलने के कारण एक भीषण लड़ाई में भारतीयों और जापानियों की मिली-जुली सेना हार गई और उसे पीछे हटना पड़ा। लेकिन आज़ाद हिंद फ़ौज कुछ अर्से तक बर्मा (वर्तमान म्यांमार) और बाद में हिंद-चीन में अड्डों वाली मुक्तिवाहिनी सेना के रूप में अपनी पहचान बनाए रखने में सफल रही। इसी सेना ने 1943 से 1945 तक शक्तिशाली अंग्रेज़ों से युद्ध किया था तथा उन्हें भारत को स्वतंत्रता प्रदान कर देने के विषय में सोचने के लिए मजबूर किया था। सन् 1943 से 1945 तक 'आज़ाद हिन्द सेना' अंग्रेज़ों से युद्ध करती रही। अन्ततः ब्रिटिश शासन को उन्होंने महसूस करा दिया कि भारत को स्वतंत्रता देनी ही पड़ेगी।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस सर्व कालिक नेता थे जिनकी ज़रूरत कल थी, आज है और आने वाले कल में भी होगी। वह ऐसे वीर सैनिक थे इतिहास जिनकी गाथा गाता रहेगा। उनके विचार, कर्म और आदर्श अपना कर राष्ट्र वह सब कुछ हासिल कर सकता है जिसका हक़दार है। स्वतंत्रता समर के अमर सेनानी, मां भारती के सच्चे सपूत थे।

ऐतिहासिक भाषण
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रंगून के 'जुबली हॉल' में सुभाष चंद्र बोस द्वारा दिया गया वह भाषण सदैव के लिए इतिहास के पत्रों में अंकित हो गया, जिसमें उन्होंने कहा था कि- "स्वतंत्रता बलिदान चाहती है। आपने आज़ादी के लिए बहुत त्याग किया है, किन्तु अभी प्राणों की आहुति देना शेष है। आज़ादी को आज अपने शीश फूल चढ़ा देने वाले पागल पुजारियों की आवश्यकता है। ऐसे नौजवानों की आवश्यकता है, जो अपना सिर काट कर स्वाधीनता देवी को भेट चढ़ा सकें। तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। इस वाक्य के जवाब में नौजवानों ने कहा- "हम अपना ख़ून देंगे।" उन्होंने आईएनए को 'दिल्ली चलो' का नारा भी दिया।

सुभाष भारतीयता की पहचान ही बन गए थे और भारतीय युवक आज भी उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं। वे भारत की अमूल्य निधि थे। 'जयहिन्द' का नारा और अभिवादन उन्हीं की देन है।

तुम मुझे ख़ून दो मैं तुम्हें आज़ादी दूँगा। सुभाष चंद्र बोस

ये घोषवाक्य आज भी हमें रोमांचित करता है। यही एक वाक्य सिद्ध करता है कि जिस व्यक्तित्व ने इसे देश हित में सबके सामने रखा वह किस जीवट का व्यक्ति होगा

देशभक्ति की भावना
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बोस जी अंग्रेजी शिक्षा को निषेधात्मक शिक्षा मानते थे। किन्तु बोस जी को उनके पिता ने समझाया- हम भारतीय अंग्रेज़ों से जब तक प्रशासनिक पद नहीं छीनेंगे, तब तक देश का भला कैसे होगा। सुभाष ने इंग्लैण्ड में जाकर आई. सी. एस. की परीक्षा उत्तीर्ण की। वे प्रतियोगिता में उत्तीर्ण ही नहीं हुए, चतुर्थ स्थान पर रहे। नेता जी एक बहुत मेधावी छात्र थे। वे चाहते तो उच्च अधिकारी के पद पर आसीन हो सकते थे। परन्तु उनकी देश भक्ति की भावना ने उन्हें कुछ अलग करने के लिए प्रेरित किया। बोस जी ने नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। सारा देश हैरान रह गया। बोस जी को समझाते हुए कहा गया- तुम जानते भी हो कि तुम लाखों भारतीयों के सरताज़ होगे ? तुम्हारे हज़ारों देशवासी तुम्हें नमन करेंगे? सुभाष ने कहा- मैं लोगों के मनों पर राज्य करना चाहता हूँ, मैं उनका हदय-सम्राट् बनना चाहता हूँ ।

कांग्रेस के स्वयं सेवक ====================

गाँधी जी द्वारा असहयोग आन्दोलन बीच में ही रोक देने के कारण सुभाष उनसे दुःखी हुए। कालान्तर में वे देशबन्धु चितरंजन दास के क़रीब आये तथा उनके विश्वासपात्र एवं अनन्य सहयोगी बनने का गौरव प्राप्त किया। वहीं पर सुभाषचंद्र बोस एक युवा प्रशिक्षक, पत्रकार व बंगाल कांग्रेस के स्वयंसेवक बने। 1923 ई. में चितरंजन दास द्वारा गठित स्वराज्य पार्टी का सुभाष चन्द्र बोस ने समर्थन किया। 1923 ई. में जब चितरंजन दास ने 'कलकत्ता नगर निगम' के मेयर का कार्यभार संभाला तो उन्होंने सुभाष को निगम के 'मुख्य कार्यपालिका अधिकारी' पद पर नियुक्त किया। 25 अक्तूबर, 1924 ई. को उन्हें गिरफ़्तार कर वर्मा की 'माण्डले' जेल में बंद कर दिया गया। सन् 1927 ई. में रिहा होने पर बोस कोलकाता लौट आए, जहाँ चितरंजन दास की मृत्यु के बाद उन्हें अस्त-व्यस्त कॉग्रेस मिली। उन्होंने कांग्रेस के उदारवादी दल की आलोचना की। 1928 ई. में प्रस्तुत नेहरू सपोर्ट के विरोध में उन्होंने एक अलग पार्टी 'इण्डिपेन्डेन्ट लीग' की स्थापना की। 1928 ई. में भारतीय राष्ट्रिय कॉग्रेस के 'कलकत्ता अधिवेशन' में उन्होंने 'विषय समिति' में 'नेहरू रिपोर्ट' द्वारा अनुमोदित प्रादेशिक स्वायत्ता के प्रस्ताव का डटकर विरोध किया। 1931 ई. में हुए गाँधी-इरविन समझौते का भी सुभाष ने विरोध किया। सुभाष उग्र विचारों के समर्थक थे। उन्हें 'ऑल इण्डियन यूनियन कांग्रेस' एवं 'यूथ कांग्रेस' का भी अध्यक्ष बनाया गया था


कांग्रेस के अध्यक्ष

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गाँधी जी कांग्रेस में फिर से सक्रिय हो गए और बोस बंगाल कांग्रेस के अध्यक्ष चुन लिए गए। सन् 1930 ई. में जब सविनय अवज्ञा आन्दोलन शुरू हुआ, बोस कारावास में थे। रिहा और फिर से गिरफ़्तार होने व अंतत: एक वर्ष की नज़रबंदी के बाद उन्हें यूरोप जाने की आज्ञा दे दी गई। निर्वासन काल में, उन्होंने 'द इंडियन स्ट्रगल'  और यूरोपीय नेताओं से भारत पक्ष की पैरवी की। सन् 1936 ई. में यूरोप से लौटने पर उन्हें फिर एक वर्ष के लिए गिरफ़्तार कर लिया गया। सन् 1938 ई. में 'भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस' का अध्यक्ष निर्वाचित होने के बाद उन्होंने 'राष्ट्रीय योजना आयोग' का गठन किया, जिसने औद्योगिक नीति को सूत्रबद्ध किया ।

अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा

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यह नीति गाँधीवादी आर्थिक विचारों के अनुकूल नहीं थी, जो प्रतीक रूप में चरखे में निष्ठा रखती थी। सन् 1939 ई. में बोस के प्रति समर्थन की अभिव्यक्ति एक गाँधीवादी प्रतिद्वंद्वी को दुबारा हुए चुनाव में हरा देने के रूप में प्रकट हुई। लेकिन गाँधी जी के विरोध के चलते इस ‘विद्रोही अध्यक्ष’ ने इस्तीफ़ा देने की आवश्यकता महसूस की।


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बुधवार, 20 जनवरी 2016

सबसे ब़डी लुटेरी विदेशी कम्पनी

परिचयः--- भारत देश में सबसे पुरानी कम्पनी हैं हिन्दुस्तान लीवर लिमिटेड Hindustan Uniliver Limited। यह 1947 में आजादी के पहले से ही भारत लूट मचा रही है । अंग्रेजों के सबसे बडे चापलूस जवाहरलाल ने इसे देश से नहीं भगाया । अंग्रेजों से पैसे खाकर इसे देश में ही लूट मचाने के लिए छूट दे दी । कुछ व्यक्तियों को इसके हिन्दुस्तानी नाम से ऐसा लगता हैं कि ये हिन्दुस्तान की कम्पनी हैं। इस कम्पनी की असलियत यह है कि यह विदेशी कम्पनी हैं। यह अमेरिका की कम्पनी हैं। इसका असली नाम Uniliver हैं। इसके हमारे देश में बहुत से उत्पाद आते हैं। जैसेः---सर्फ,साबुन, शैम्पु, प्यूरी फायर आदि । इस कम्पनी का एक साबुन हैं, लाइफ वाय Life bouy. इस साबुन का टीवी पर भी विज्ञापन आता हैं। आप यह सोचते होंगे की यह देशी साबुन हैं, लेकिन आपको बता दें कि यह विदेशी साबुन है । यह बहुत ही घटिया साबुन है ।

मैं आपको पहले साबुन के प्रकारों के बारे में बता देता हूँ, साबुन तीन प्रकार का होता हैंः--
१.नहाने का साबुन Bathsoap,
२.हाथ धोने का साबुन Toiletsoap,
३.जानवरों के नहाने का साबुन Carbolicsoap.
 हकीकत क्या हैं ?
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यह कम्पनी खुद कहती हैं कि हमारा साबुन Carbolicsoap हैं। मतलब यह साबुन जानवरों के नहाने का हैं। इस साबुन से विदेशों में जानवरों को निहलाया जाता हैं।(जैसे-कुत्ता, बिल्ली, सूअर, आदि) और हमारे देश में इस साबुन से इंसान नहाते हैं।
हर कम्पनी सबसे पहले नहाने का साबुन Bathsoap बनाती हैं, फिर उसके बाद हाथ धोने का साबुन Toiletsoap बनाती हैं। इन दोनों साबुन को बनाने के बाद जो कचरा बचता हैं, उससे जानवरों के नहाने का साबुन Carbolic बनाया जाता हैं।

इसी कम्पनी का डिटौल भी आता है । इसे आप बन्द कर दें । इसके स्थान पर पतञ्जलि का उत्पाद खरीद सकते हैं ।
यह कम्पनी हर साल हमारे देश में लगभग 40,00,000,00 चालीस करोड़ साबुन बेच देती हैं। एक साबुन कम्पनी को लगभग 1.5-2 रुपये का पड़ता हैं और यह इसे हमारे देश में 10 रुपये का बेचती हैं। कभी-कभी तो 12 रुपये का बेचती हैं। इस कम्पनी का एक सर्फ भी आता हैं, वो कम्पनी को करीब 19-20 रुपये किलो में बनने के बाद पड़ता हैं और यह कम्पनी उसे करीब 150 रुपये किलो में बेचती हैं।

अब आपको पता चल ही गया होगा कि ये विदेशी कम्पनी हमारे देश को कैसे लूट रही हैं।

 इस कम्पनी की हमारे देश में बिक्री 1998 में 14,000,00,000,00 चौदह हजार करोड़ थी। लेकिन 2008 में इनकी बिक्री घटकर करीब 9,800,00,000,00 नौ हजार आठ सौ करोड़ रह गयी।

इसका सीधा सीधा मतलब यह हैं कि हमारे देश में इस कम्पनी की बिक्री घटी हैं। अगर आप सब लोगों ने इन विदेशी कम्पनियों का इसी तरह से उपयोग करना बन्द कर दिया तो हमारे देश में वो दिन दूर नहीं जब हमारे देश में सब लोग स्वदेशी को अपनाने लगेंगे और स्वदेशी का झण्डा लहरायेगा।

अगर आप सच्चे हिन्दुस्तानी हैं, तो आप भी इस कम्पनी के उत्पाद खरीदना बन्द कर दीजिए ।


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