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गुरुवार, 12 मई 2016

भारत में क्लोन का आविष्कार

!!!---: भारत में क्लोन का आविष्कार :---!!!
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ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में जब भारत उन्नति के शिखर पर था, तब यूरोप, अमेरिका, आस्ट्रेलिया आदि देश शिशु था । शिशु कहना भी अनाचार है, कहना चाहिए कि वे जंगली थे । ग्रीक में एलोपैथी के जन्मदाता हेरोक्रेट्स माना जाता है । उसका तो सिद्धान्त ही यह था कि कोई भी बीमारी हो , सबका एक ही इलाज है और वह है कि रोगी के शरीर में भूत घूस गया है, उसे निकालने के लिए हाथ की नस काट दो और खून निकल जाने दो, जिससे भूत भाग जाएगा और रोगी ठीक हो जाएगा ।

भेड-बकरियों को चराने वाले यूरोपीयन लोग चिकित्सा को जानते ही नहीं थे । आपको पता है कि अमेरिका का प्रथम राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन की मृत्यु कैसे हुई थी । उनतो जुकाम हो गया । डॉक्टर को बुलाया गया । सतरहवीं-अठारहवीं शताब्दी तक वहाँ एक ही इलाज होता था, खून निकाल दो । डॉक्टर ने वाशिंगटन के दोनों हाथों की नस काट दी और सुबह आने की बात कहकर चला गया । सुबह तक उसका बहुत सारा खून निकल गया । शरीर ठण्डा हो गया और वह मर चुका था । इस तरह यूरोप के एक नहीं 100 से अधिक राजा मारे गए । आम जनता तो असंख्य थी ।

हमारे देश में शल्य चिकित्सा अपने चरम शिखर पर थी । 1835 तक हमारे देश में जो चिकित्सा होती थी, उस समय तक ब्रिटेन में चिकित्सा के नाम पर रोगी के शरीर से खून निकाला जाता था ।

क्लोन के नाम पर अमेरिका, यूरोप आदि के देशों में अभी तक केवल पशु पर ट्रायल चल रहा है , जबकि भारत में 5000 वर्ष पूर्व ही मानव क्लोन बना दिया गया था । महाभारत में धृतराष्ट्र के सौ पुत्र थे । ये क्लोन से ही हुए थे ।

कौरवों का जन्म एक रहस्य :----
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कौरवों को कौन नहीं जानता। धृतराष्ट्र और गांधारी के 99 पुत्र और एक पुत्री थीं जिन्हें कौरव कहा जाता था। कुरु वंश के होने के कारण ये कौरव कहलाए। सभी कौरवों में दुर्योधन सबसे बड़ा था। गांधारी जब गर्भवती थी, तब धृतराष्ट्र ने एक दासी के साथ सहवास किया था , जिसके चलते युयुत्सु नामक पुत्र का जन्म हुआ। इस तरह कौरव सौ हो गए। युयुत्सु एन वक्त पर कौरवों की सेना को छोड़कर पांडवों की सेना में शामिल हो गया था।

गांधारी ने वेदव्यास से पुत्रवती होने का वरदान प्राप्त कर किया। गर्भ धारण कर लेने के पश्चात भी दो वर्ष व्यतीत हो गए, किंतु गांधारी के कोई भी संतान उत्पन्न नहीं हुई। इस पर क्रोधवश गांधारी ने अपने पेट पर जोर से मुक्के का प्रहार किया जिससे उसका गर्भ गिर गया।

वेदव्यास ने इस घटना को तत्काल ही जान लिया। वे गांधारी के पास आकर बोले- 'गांधारी! तूने बहुत गलत किया। मेरा दिया हुआ वर कभी मिथ्या नहीं जाता। अब तुम शीघ्र ही सौ कुंड तैयार करवाओ और उनमें घृत (घी) भरवा दो।'

वेदव्यास ने गांधारी के गर्भ से निकले मांस पिण्ड पर अभिमंत्रित जल छिड़का जिससे उस पिण्ड के अंगूठे के पोरुये के बराबर सौ टुकड़े हो गए। वेदव्यास ने उन टुकड़ों को गांधारी के बनवाए हुए सौ कुंडों में रखवा दिया और उन कुंडों को दो वर्ष पश्चात खोलने का आदेश देकर अपने आश्रम चले गए। दो वर्ष बाद सबसे पहले कुंड से दुर्योधन की उत्पत्ति हुई। फिर उन कुंडों से धृतराष्ट्र के शेष 99 पुत्र एवं दु:शला नामक एक कन्या का जन्म हुआ।
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रविवार, 8 मई 2016

भारतीय इतिहास का महान बलिदान ।।

!!!---: चूडावत की वीर भार्या :---!!!
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भारतीय इतिहास का महान बलिदान ।।

ऐसा बलिदान दुनिया के किसी भी इतिहास में कभा भी नहीं मिलेगा ।

महान् वीर राजपूतनी के बलिदान की घटना

राजपूताने में रूपनगर नामक एक छोटा-सा राज्य था । वहाँ की राजकुमारी बडी रूपवती थी । औरंगजेब ने उसकी प्रशंसा सुनकर उसे अपने हरम में रखने का निश्चय किया । बादशाह के विवाह का प्रस्ताव लेकर कई हजार मुगल सैनिकों का दल शीघ्र ही रूपनगर जा पहुँचा । राजमहल में हाहाकार मच गया । राजा मुगल सम्राट् के बल-वैभव को जानते थे, इसलिए वे अपने मान की रक्षा करने में असमर्थ थे । मुगलों ने उनके महल को घेर रखा था । राजकुमारी स्वयं औरंगजेब से घृणा करती थी । उसने स्पष्ट शब्दों में बादशाह के प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया ।

मुगल सैनिक उसे पकडने के लिए महल में घुस गए । राजकुमारी ने अपनी रक्षा का कोई अन्य उपाय न देखकर मैवाडपति वीरवर राजसिंह के नाम तुरन्त एक पत्र लिखकर पुरोहित के हाथ भेज दिया । इधर मुगलों ने लड-भिडकर राजकुमारी को अपने अधिकार में कर लिया और उसे एक डोली में लेकर वे दिल्ली के लिए रवाना हो गए ।

रूपनगर का पुरोहित भागता हुआ मेवाड पहुँचा । वहाँ उसने महाराणा को राजकुमारी का पत्र दिया । उसे पढते ही महाराणा की दाहिनी भुजा फडकने लगी । एक निस्सहाय हिन्दू-बालिका ने घोर संकट में उन्हें भगवान् की तरह स्मरण किया था । वे भी भारत-सम्राट् औरंगजेब की प्रबल शक्ति से परिचित थे । फिर भी धर्म-पालन के लिए उद्यत हो गए । उन्होंने अपने कई चुने हुए शूरवीर सरदारों को शीघ्र युद्ध के लिए तैयार होने का आदेश दिया । उनमें एक चूडावत सरदार भी था ।

चूडावत राजमहल में अपने घर आया । वहाँ यह बडे विचार-संकट में पड गया । कुछ ही दिनों पहले उसका विवाह हुआ था । वह अपनी नई स्त्री को छोडकर युद्ध में जाना नहीं चाहता था । लेकिन राजा की आज्ञा का उल्लंघन कैसे करता । वह इस उलझन में पड गया कि क्या करे, क्या न करे ।

पति को चिन्तित देखकर स्त्री ने उसकी खिन्नता का कारण पूछा । चूडावत ने कहा, "रानी, औरंगजेब रूपनगर की राजकन्या को उसकी इच्छा के विरुद्ध अपनी बेगम बनाना चाहता है । मुगल सेना उसे पकड कर दिल्ली ले जा रही है । उस अबला ने हमारे महाराणा से सहायता माँगी है । महाराणा उसके उद्धार का संकल्प करके स्वयं मुगलों से लोहा लेने जा रहे हैं । मुझे भी वे अपने साथ ले जाना चाहते हैं । मैं यदि गया तो संभवतः फिर न लौट सकूँगा, क्योंकि मुगल हमसे बलवान् हैं, वे किसी को जीता न छोडेंगे । इसलिए मैं सोच रहा हूँ कि क्या करूँ--एक ओर महाराणा की आज्ञा है, दूसरी ओर प्राण-संकट ।"

पति को इस प्रकार विचलित देखकर पत्नी फिर बोली---"स्वामी, मैं तो यही सुनती आई हूँ कि राजपूत लोग मृत्यु से नहीं डरते और हँसते-हँसते कर्म की बलिवेदी पर अपने प्राण चढा देते हैं । आप तो सच्चे राजपूत हैं । जाति-धर्म की रक्षा करना , अबलाओं को विपत्ति से उबारना आपका कर्त्तव्य है । आपको इस अनाथ बालिका के उद्धार के लिए अवश्य महाराणा के साथ जाना चाहिए । आप शरीर का मोह छोडकर अपने धर्म का पालन कीजिए ।"

चूडावत ने कहा, "मुझे अपने शरीर का मोह नहीं है । मुझे तो केवल तुम्हारी चिन्ता है । मेरे न रहने पर कौन तुम्हारी रक्षा करेगा ? तुम्हें अकेली छोडकर कैसे युद्ध में जाऊँ ?"

भार्या ने फिर कहा, "आप मेरी चिन्ता न कीजिए । मेरी रक्षा तो मेरा धर्म करेगा । इस समय तो आप केवल अपने कर्त्तव्य का पालन कीजिए । आपको अपनी एक बहन का मान बचाना है । अधिक सोचने-विचारने का समय नहीं है, अस्त्र-शस्त्र उठाइए और तुरन्त युद्ध के लिए प्रस्थान कीजिए ।"

वीर स्त्री ने तत्क्षण अपने हाथ से स्वामी का कवच पहनाया, उसकी कमर में तलवार बाँधी, मस्तक पर कुंकुम का टीका लगाया और उसकी दाहिनी भुजा पूजकर आरती उतारी । चूडावत रण में जाने को विवश हो गया । पत्नी को बार-बार देखता हुआ वह अपने घोडे पर बैठा और धीरे-धीरे राजदुर्ग की ओर चल पडा । ज्यों-ज्यों उसका घोडा आगे बढता था, त्यों-त्यों मन पीछे की ओर भागता था । वह बारम्बार मुडकर अपने घर की ओर देखता था ।

स्त्री द्वार पर खडी अपने पति की दशा देख रही थी । वह समझ गई कि पतिदेव उत्साह से नहीं जा रहे हैं और युद्ध में भी वे ऐसी ही उत्साहहीनता दिखाकर जाति और कुल को कलंकित कर देंगे । उसने सोचा कि जिस पवित्र कार्य के लिए आज इतने राजपूत अपना रक्त बहाने के लिए जा रहे हैं, उसी के लिए यदि मैं अपने जीवन की बलि चढा दूँ तो सम्भवतः वह सफल हो जाएगा और उससे मेरे पति भी निश्चिन्त होकर अपने कर्त्तव्य का पालन कर सकेंगे ।

ऐसा विचार करके उस वीर रमणी ने अपने एक विश्वासपात्र सेवक को बुलाया और अपने हाथ में तलवार लेकर उससे कहा, "देखो, मैं अभी अपने हाथ से अपना सिर काटने जा रही हूँ ष तुम उसे लेकर घोडे पर वहाँ चले जाना, जहाँ मेरे पति मुगलों से लडने गए हैं । अन्तिम संदेश कह देना कि अब वे मेरी चिन्ता छोडकर युद्ध करें और जिस तरह भी हो सके रूपनगर की राजकुमारी को दुष्टों के हाथ से बचा ले ।"

सेवक यब सुनकर स्तब्ध हो गया । उसके कुछ कहने या करने के पहले ही राजपूतनी ने तलवार से अपना सिर काट डाला । उसका सेवक उसे लेकर युद्ध भूमि की ओर चल पडा ।

चूडावत सरदार महाराणा राजसिंह के पास पहुँच चुका था । महाराणा स्वयं अपने शूरवीर सवारों के साथ युद्ध-यात्रा के लिए तैयार खडे थे । उन्हें लेकर वे वेग से अरावली पर्वत की ओर बढे । चूडावत भी अधमरा-सा होकर उनके पीछे-पीछे चल पडा । बार-बार उसे अपनी पत्नी का ही ध्यान आता था ।

अरावली पर्वत की घाटी में पहुँचकर राजसिंह ने अपना घोडा रूपनगर की ओर बढाया । थोडी ही दूर जाने पर उन्होंने देखा कि उधर से मुगल सेना ढोल बजाती हुई चली आ रही है । महाराणा उसका रास्ता रोककर खडे हो गए और अपने वीरों को उत्साहित करने लगे । चूडावत का मुँह लटका हुआ था । ऐसे अवसर पर वीरों में जो उल्लास दिखाई पडता है, वह उसमें नहीं था । उसका मन कहीं और था । उसी समय उसका सेवक वहाँ आ पहुँचा । उसने सम्मानपूर्वक चूडावत की पत्नी का कटा सिर उसके हाथ में रख दिया और उसने जो अन्तिम संदेश कहा था, उसे भी कह सुनाया ।

क्षण-भर के लिए चूडावत की आँखों के आगे अँधेरा छा गया । लेकिन शीघ्र ही उसके शरीर में बिजली-सी दौडने लगी । उसे ऐसा ज्ञात हुआ कि मानो उसकी पत्नी सामने ही खडी है और शत्रुओं का सर्वनाश करने को कह रही है ।

पत्नी के कटे सिर को गले में केशों से बाँधकर चूडावत ने संकल्प किया कि आज प्राण देकर भी मैं अपनी पत्नी की अन्तिम इच्छा अवश्य पूरी करुँगा । उसकी छाती तन गई, भुजा फडकने लगी, आँखें लाल हो गई । कोई शक्ति उसके हृदय को निरन्तर उत्तेजित करने लगी ।

मुगल सेना ज्यों ही निकट आई, महाराणा राजसिंह अपने वीरों को लेकर ललकारते हुए उसपर टूट पडे । चूडावत ने सबसे आगे बढकर मुगलों को साग-मूली की तरह काटना आरम्भ किया । उस समय मुण्डमाला लटकाए हुए वह साक्षात रुद्र जैसा लगता था । उसने सैकडों मुगलों को देखते-देखते मार गिराया । मुगल संख्या में अधिक थे, फिर भी वे मुट्ठी भर राजपूतों को पीछे नहीं हटा सके । चूडावत ने आगे बढकर शत्रुओं के हाथ से रूपनगर की राजकुमारी को छुडा लिया । मुगलों के पैर उखड गए । वे तोबा-तोबा चिल्लाते हुए इधर-उधर भाग गए । इस युद्ध में चूडावत अद्भुत पराक्रम दिखाता हुआ मारा गया ।

महाराजा राजसिंह और चूडावत की स्वर्गीय वीर पत्नी की अन्तिम कामना पूरी हो गई । महाराणा रूपनगर की राजकुमारी को चित्तौड ले आए । वहाँ वह उनके आश्रय में रहने लगी ।


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